पितृ बाधा तब उत्पन्न होती है जब परिवार के पूर्वज (दादा, दादी, नाना, नानी) किसी कारणवश मोक्ष प्राप्त नहीं कर पाते और उनकी आत्मा अशांत रहती है। इसके कारण वंशजों को कष्ट उठाना पड़ता है।
प्रेत बाधा तब होती है जब कोई अकाल मृत्यु (दुर्घटना, आत्महत्या, हत्या) से मरे हुए व्यक्ति की आत्मा किसी स्थान या व्यक्ति से चिपक जाती है। यह विशेष तांत्रिक विधियों से शांत की जाती है।
पिंड दान एक प्राचीन वैदिक अनुष्ठान है जिसमें चावल, जौ, तिल, कुश और जल से बने पिंड (गोल आकार) पितरों को अर्पित किए जाते हैं:
श्राद्ध पक्ष (पितृ पक्ष) भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक 16 दिन का विशेष काल है। इस दौरान पितर पृथ्वी-लोक पर आते हैं और श्राद्ध-तर्पण से प्रसन्न होकर वंशजों को आशीर्वाद देते हैं। इस काल में किया गया पिंड दान 12 गुना अधिक फलदायी होता है।
गया (बिहार) में स्थित विष्णुपद मंदिर में भगवान विष्णु के चरण-चिह्न हैं। वायु पुराण के अनुसार गया में एक बार पिंड दान करने से 100 पीढ़ियों के पूर्वजों को मोक्ष मिलता है। यही कारण है कि पिंड दान के लिए गया सबसे पवित्र स्थान है।
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