भगवान शिव का महामृत्युंजय स्वरूप समस्त ब्रह्मांड के जीवन-दाता व संहारक दोनों हैं। जब आधुनिक चिकित्सा, दवाएं और उपचार बेअसर होने लगें अथवा जीवन पर अकाल संकट मंडराने लगे, तब वेदोक्त महामृत्युंजय अनुष्ठान संजीवनी शक्ति का कार्य करता है। यह अनुष्ठान न केवल शारीरिक रोगों का शमन करता है, बल्कि मानसिक अवसाद, भय और प्राण-संकट से रक्षा कर दीर्घायु प्रदान करता है।
हृदय, कैंसर, श्वसन, पक्षाघात व गंभीर रोगों में चमत्कारी स्वास्थ्य लाभ।
सड़क दुर्घटना, विष, अचानक आघात व अनहोनी के भय से पूर्ण अभय कवच।
कुण्डली के 2nd, 7th व 8th भाव के अशुभ मारक ग्रहों की शांति।
निम्न संकेतों या ग्रह स्थितियों में यह अनुष्ठान जीवन-रक्षक सिद्ध होता है:
रुद्राक्ष की माला से पूर्व या उत्तर की ओर मुख कर नित्य 108 बार, अथवा अनुष्ठान में 1,25,000 जप सविधि दशांश हवन के साथ किया जाता है।
प्रति सोमवार शिवलिंग पर कच्चा दूध, शहद और 108 बेलपत्र अर्पित कर रोग मुक्ति की प्रार्थना करें।
गिलोय (अमृता) की समिधा और दूर्वा से किए गए हवन से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में तीव्र वृद्धि होती है।
तांबे या चांदी के पत्र पर सिद्ध महामृत्युंजय यंत्र को रोगी के कक्ष या गले में धारण कराने से भय व पीड़ा का निवारण होता है।
7 या 11 वैदिक ब्राह्मणों द्वारा त्र्यंबकेश्वर अथवा काशी में 7 दिनों तक निरंतर जप व महाभिषेक से जीवन रक्षा होती है।
पवित्र ज्योतिर्लिंग तीर्थ पर रोगी के नाम व गोत्र से संकल्प कराएं। अभिमंत्रित रक्षा ताबीज व प्रसाद घर भेजा जाता है।
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